भारत का अद्भुत मंदिर: 12वीं शताब्दी में स्थापना

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भारत का अद्भुत मंदिर: 12वीं शताब्दी में स्थापना, 14 वर्षों तक चला निर्माण कार्य! ध्वज फहराता है हवा की विपरीत दिशा में

भारत का अद्भुत मंदिर
भारत का अद्भुत मंदिर

भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उसके मंदिर हैं। इनमें से कई मंदिर अपनी अद्वितीय वास्तुकला और रहस्यमय विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध हैं। ऐसा ही एक अद्भुत मंदिर है, जिसकी स्थापना 12वीं शताब्दी में हुई थी और जिसका निर्माण कार्य 14 वर्षों तक चला। इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसका ध्वज हमेशा हवा की विपरीत दिशा में फहराता है।

मंदिर की स्थापना और इतिहास

यह अद्भुत मंदिर ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर है। इसका निर्माण 12वीं शताब्दी में हुआ था। यह मंदिर भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण गंग वंश के राजा अनंगभीम देव ने शुरू किया था और इसे पूरा करने में 14 वर्ष लगे थे।

वास्तुकला और निर्माण कार्य

जगन्नाथ मंदिर अपनी विशाल और भव्य वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भारतीय वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है और इसमें कई शिल्पकारी कृतियाँ शामिल हैं। मंदिर का मुख्य शिखर (गर्भगृह) 65 मीटर ऊँचा है और इसे सफेद और लाल पत्थरों से बनाया गया है।

ध्वज का रहस्य

इस मंदिर की सबसे अद्भुत विशेषता इसका ध्वज है। मंदिर के शिखर पर फहराता हुआ ध्वज हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है, जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी एक रहस्य है। यह ध्वज रोज बदल दिया जाता है और इसे बदलने की प्रक्रिया भी अत्यंत जोखिमपूर्ण होती है। पुरी के स्थानीय पुजारियों द्वारा ध्वज को बिना किसी सुरक्षा उपकरण के बदलना एक प्राचीन परंपरा है।

अन्य रहस्यमय विशेषताएं

  1. मंदिर की छाया: मंदिर के शिखर की छाया दिन के किसी भी समय पृथ्वी पर नहीं पड़ती है। यह एक और रहस्यमय पहलू है जिसे वैज्ञानिक अभी तक पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं।
  2. सिंहद्वार की ध्वनि: मंदिर के मुख्य द्वार (सिंहद्वार) से समुद्र की आवाज़ नहीं सुनाई देती है, जबकि मंदिर के अंदर जाते ही समुद्र की तेज़ आवाज़ सुनाई देने लगती है।

संस्कृति और परंपराएँ

जगन्नाथ मंदिर अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां हर साल होने वाली रथयात्रा विश्व प्रसिद्ध है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को विशाल रथों में बिठाकर नगर भ्रमण कराया जाता है।

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